19 अगस्त 2020 - 14:25
इमारात में ईरान के प्रभारी राजदूत को तलब करने से अबू धाबी का कलंक नहीं मिटेगा

इस्राईल के साथ संबंध स्थापित करने के संयुक्त अरब इमारात के समझौते पर इस्लामी जगत में कड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आने के बाद इस देश के विदेश मंत्रालय ने अबू धाबी में ईरान के प्रभारी राजदूत को तलब किया।

हालांकि इमारात का यह क़दम अप्रत्याशित नहीं था लेकिन इस बड़ी ग़द्दारी पर इतनी व्यापक प्रतिक्रियाओं की अबू धाबी को आशा नहीं थी। वक़्त बीतने के साथ प्रतिक्रियाएं कम नहीं हुई हैं बल्कि उनमें वृद्धि ही होती जा रही है। इस समझौते की घोषणा के पांच दिन बाद भी इस्लामी जगत में इसके ख़िलाफ़ व्यापक स्तर पर प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। शायद इमारात ने ईरान के प्रभारी राजदूत को तलब करके इस्लामी जगत को यह संदेश देने का प्रयास किया था कि अगर प्रतिक्रियाएं जारी रहती हैं तो अन्य देशों के साथ भी इसी तरह का बर्ताव किया जा सकता है।

 

संयुक्त अरब इमारात और इस्राईल के बीच हुए समझौते पर ईरान के कड़े रुख़ को अबू धाबी ने अपनी संप्रभुता पर हमला बताया है जबकि फ़ार्स की खाड़ी के इस छोटे से तटवर्ती देश ने अपने इस ख़तरनाक क़दम के माध्यम से लगभग पौने दो अरब मुसलमानों की संयुक्त पहचान पर हमला कर दिया है और वास्तव में सभी मुसलमान देशों की संप्रभुता पर और साथ ही क्षेत्र व संसार की शांति व सुरक्षा पर हमला कर दिया है।

 

अपने क़दम के सभी विरोधियों के बीच केवल ईरान पर इमारात का ध्यान केंद्रित करना वास्तव में इस हक़ीक़त को मानना है कि फ़िलिस्तीनी जनता भी और दुनिया के सभी मुसलमान भी इस्लामी गणतंत्र ईरान के नेतृत्व में फ़िलिस्तीनी काॅज़ के संबंध में एकमत और एकजुट हैं। ईरान के राष्ट्रपति ने सऊदी अरब, बहरैन और संयुक्त अरब इमारात पर हमले के सद्दाम के फ़ैसले की तरफ़ इशारा करते हुए कहा भी है कि सिर्फ़ इस्लामी गणतंत्र ईरान ने इस हमले को रोका था और कुछ ही समय बीतेगा कि इमारात भी, इस्राईल से बचने के लिए इस्लामी जगत की शरण में आएगा।

 

इस्राईल और इमारात के बीच संबंध स्थापना की घोषणा का समय भी गंभीर रूप से विचार योग्य है। ट्रम्प को विदेश नीति के क्षेत्र में अपनी ख़ाली झोली को भरने की बहुत ज़्यादा ज़रूरत है ताकि चुनाव में उनके पास कहने के लिए कुछ तो रहे। दूसरी तरफ़ नेतनयाहू भी बुरी तरह से आंतरिक संकटों में उलझे हुए हैं और उनके ख़िलाफ़ रात में होने वाले प्रदर्शन रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। बिन ज़ायद ने शायद यह सोचा हो कि बैरूत धमाके से पैदा होने वाली परिस्थितियों में जनमत का ध्यान उनकी ग़द्दारी की तरफ़ नहीं जाएगा जबकि फ़िलिस्तीनी काॅज़ इतना बड़ा है कि कभी भी और किसी भी परिस्थिति में मुसलमानों और संसार के स्वतंत्र लोगों के ध्यान से दूर नहीं होगा।